जम्मू-कश्मीर : हाईकोर्ट ने कहा- वन्यजीवों के अवशेष से जुड़ा कारोबार ड्रग्स जैसा नुकसानदेह

अमर उजाला नेटवर्क, श्रीनगर
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Wed, 24 Nov 2021 12:35 AM IST

सार

हाईकोर्ट ने कहा कि फर कारोबार से जुड़े व्यापारियों को पुनर्वास का अधिकार नहीं।

कोर्ट (प्रतीकात्मक तस्वीर।)
– फोटो : iStock

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जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि लुप्तप्राय वन्यजीवों या उनके अवशेष से बनी वस्तुओं का कारोबार ड्रग्स के कारोबार जैसा नुकसानदेह है। ऑल फर ट्रेडर्स एंड मैनुफैक्चरर्स एसोसिएशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संजीव धर ने कहा कि ऐसे मामले में पुनर्वास का किसी को कोई अधिकार नहीं है। एसोसिएशन से जुड़े 19 फर व्यापारियों ने याचिका में कहा है कि जम्मू-कश्मीर वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम 1978 के लागू होने से उनका कारोबार ठप हो गया। फर के कारोबार पर पूरी तरह से प्रतिबंध को देखते हुए सरकार की ओर से उनका पुनर्वास किया जाए।

कोर्ट ने कहा कि जो गतिविधि किसी वन्य जीव के अस्तित्व को मिटा सकती है। पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा सकती है। ऐसी गतिविधि को किसी भी समाज में स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसी गतिविधियों को बाकायदा सांविधानिक प्रावधान बनाकर सख्ती से रोक लगाई गई है। कोर्ट ने कहा कि याची पक्ष को भलीभांति पता था कि वे जिस कारोबार में हैं, उसे कभी भी रोका जा सकता है।

कोर्ट ने मंडलायुक्त के नेतृत्व वाली कमेटी की ओर से पुनर्वास का लाभ फर उत्पादों के कारीगरों तक सीमित करने के फैसले को भी सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि कारीगरों का पुनर्वास और कारोबारियों को इससे वंचित रखना किसी भी सूरत में सुविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं है। उन्होंने कहा कि संविधान के मौलिक दायित्वों में शामिल अनुच्छेद 51-ए के तहत वन, झील, नदी और वन्यजीवों के प्रति हर नागरिक से संवेदनशील होने की अपेक्षा की जाती है।

विस्तार

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि लुप्तप्राय वन्यजीवों या उनके अवशेष से बनी वस्तुओं का कारोबार ड्रग्स के कारोबार जैसा नुकसानदेह है। ऑल फर ट्रेडर्स एंड मैनुफैक्चरर्स एसोसिएशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संजीव धर ने कहा कि ऐसे मामले में पुनर्वास का किसी को कोई अधिकार नहीं है। एसोसिएशन से जुड़े 19 फर व्यापारियों ने याचिका में कहा है कि जम्मू-कश्मीर वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम 1978 के लागू होने से उनका कारोबार ठप हो गया। फर के कारोबार पर पूरी तरह से प्रतिबंध को देखते हुए सरकार की ओर से उनका पुनर्वास किया जाए।

कोर्ट ने कहा कि जो गतिविधि किसी वन्य जीव के अस्तित्व को मिटा सकती है। पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा सकती है। ऐसी गतिविधि को किसी भी समाज में स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसी गतिविधियों को बाकायदा सांविधानिक प्रावधान बनाकर सख्ती से रोक लगाई गई है। कोर्ट ने कहा कि याची पक्ष को भलीभांति पता था कि वे जिस कारोबार में हैं, उसे कभी भी रोका जा सकता है।

कोर्ट ने मंडलायुक्त के नेतृत्व वाली कमेटी की ओर से पुनर्वास का लाभ फर उत्पादों के कारीगरों तक सीमित करने के फैसले को भी सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि कारीगरों का पुनर्वास और कारोबारियों को इससे वंचित रखना किसी भी सूरत में सुविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं है। उन्होंने कहा कि संविधान के मौलिक दायित्वों में शामिल अनुच्छेद 51-ए के तहत वन, झील, नदी और वन्यजीवों के प्रति हर नागरिक से संवेदनशील होने की अपेक्षा की जाती है।

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